तंबाकू पर एक नई बहस

आर सुकुमार/ संपादक, मिंट Updated: 17 अप्रैल, 2017 12:50 AM

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तंबाकू कंपनियों में सरकार की क्या सीधी या परोक्ष रूप से कोई हिस्सेदारी होनी चाहिए? यह एक ऐसा सवाल है, जिसे लेकर कुछ लोग बंबई हाईकोर्ट पहुंचे हैं, जिनमें टाटा समूह के ट्रस्टीज भी शामिल हैं। यह मामला आईटीसी लिमिटेड से जुड़ा है, जिसे ‘मुख्यत:’ एक तंबाकू कंपनी माना जाता है। हालांकि अभी अदालत को यह तय करना है कि वह इस मामले को स्वीकार करती है या नहीं?

आईटीसी कोलकाता-स्थित कंपनी है, जो मूल रूप से एक तंबाकू कंपनी ही है। हालांकि इसने सफलतापूर्वक दूसरे कारोबारों में भी अपने पांव पसारे हैं, खासकर कन्फेक्शनरी (मिंटो और कैंडीमैन ब्रांड की टॉफियां बनाने) और पैकेज वाले उपभोक्ता वस्तुओं में। वैसे, कंपनी के एक एग्जीक्यूटिव (कार्यकारी पदाधिकारी) ने इसका पुरजोर विरोध किया था कि मिंट  ने आखिर कैसे आईटीसी को एक तंबाकू कंपनी बताया? मगर असलियत यह है कि आज भी इसकी 60 फीसदी कमाई तंबाकू कारोबार से होती है, और 31 दिसंबर, 2016 को खत्म हुई तिमाही में कुल लाभ का 75 प्रतिशत इसने इसी कारोबार से कमाया है। लिहाजा याचिकाकर्ताओं ने यदि आईटीसी को एक तंबाकू कंपनी बताया है, तो वह गलत नहीं लगता।

तंबाकू सेहत का कितना बड़ा दुश्मन है, इस पर किसी बहस की जरूरत नहीं है। मगर देश की इस सबसे बड़ी सिगरेट कंपनी को हमेशा इस बात की नाराजगी रही है कि सरकार बीड़ी या तंबाकू के दूसरे उत्पादों पर टैक्स क्यों नहीं लगाती? मेरा मानना है कि यह बिल्कुल अलग मसला है, क्योंकि सीमा पार तस्करी सिगरेट की ही होती है। लिहाजा यहां सवाल यह है कि क्या सिगरेट नुकसानदेह है? और इसका जवाब स्वाभाविक तौर पर ‘हां’ ही होगा।
सरकार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आईटीसी में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखती है। पांच बीमा कंपनियों और एक कथित द स्पेसिफाइड अंडरटेकिंग ऑफ यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (एसयूयूटीआई) के माध्यम से सरकार की आईटीसी में 32 फीसदी हिस्सेदारी है। बंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले लोगों का भी यही सवाल है कि क्या सरकार को ऐसा करना चाहिए?

आईटीसी को चलाने की जिम्मेदारी एक बोर्ड के ऊपर है, ठीक एक दूसरी निजी कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) की तरह, जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। भारतीय कानून के मुताबिक, इन कंपनियों के प्रमोटर्स नहीं हो सकते; न भारत में और न ही विदेशों में। इनकी कमान प्रोफेशनल मैनेजरों के हाथों में होती है, जो शेयर बाजार के माध्यम से कंपनी के शेयर खरीदते हैं। इन दोनों कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी यूएस-64 के दौर से देखी जा सकती है। यूएस-64 असल में रिर्टन की गारंटी देने वाला एक म्यूचुअल फंड था, जिसका संचालन यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (यूटीआई) करता था। मगर 2000 के दशक की शुरुआत में यह आर्थिक मुश्किलों में फंस गया। चूंकि यूनिटों की कीमतें गारंटी रिटर्न से कम हो गईं, इसलिए सरकार ने इसके शेयर ले लिए। इनमें से कुछ शेयर तो अब इतिहास बन चुके हैं। 

इन दोनों कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी का यह फायदा हुआ कि इन पर किसी देसी या विदेशी कॉरपोरेट घराने का कब्जा न हो सका। मसलन, सरकारी हिस्सेदारी का ही नतीजा था कि 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में एलऐंडटी का अधिग्रहण रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड नहीं कर सकी, जबकि  धीरूभाई अंबानी के पास कुछ दिनों तक इस कंपनी की कमान भी रही और वह कंपनी के चैयरमैन भी थे। आखिर यह सब कैसे और क्यों हुआ, यह एक लंबी और दिलचस्प कहानी है, जिसकी चर्चा फिर कभी करूंगा। फिलहाल, एलऐंडटी की तरह सरकार की हिस्सेदारी के कारण ही ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको कंपनी आईटीसी पर कब्जा न जमा सकी, जबकि विभिन्न कंपनियों के माध्यम से उसके 30 फीसदी शेयर आईटीसी में रहे हैं।

समय-समय पर ऐसी बातें भी उठती रही हैं कि सरकार एसयूयूटीआई के माध्यम से इन दोनों कंपनियों की अपनी हिस्सेदारी बेच रही है, मगर आईटीसी मामले में ऐसे प्रस्ताव हमेशा इस चेतावनी के साथ आते दिखते हैं कि ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको को इन शेयरों की बोली नहीं लगाने दी जाएगी। ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि हमें आईटीसी और एलऐंडटी जैसी बोर्ड प्रशासित और प्रोफेशनल तरीके से संचालित कंपनियों की और अधिक जरूरत है।

दिलचस्प है कि आईटीसी को दूसरे तरीके से भी सरकारी सुरक्षा मिलती है। दरअसल, हमारी हुकूमत तंबाकू उत्पादों के निर्माण में प्रत्यक्ष विदेश निवेश की अनुमति नहीं देती, और पिछले वर्ष मीडिया रिपोर्टों में कहा भी गया था कि तंबाकू व्यवसाय में फ्रेंचाइजिंग, प्रबंधन से जुड़े अनुबंध और तकनीकी सहयोग की अनुमति देने पर वाणिज्य मंत्रालय कोई विचार नहीं कर रहा है। ऐसा करने के पीछे सरकार के जो तर्क थे, वे स्थानीय उद्योगों की सुरक्षा नहीं, बल्कि तंबाकू के नुकसानदेह प्रभाव थे। सरकार की इस सोच की तारीफ करनी चाहिए।
मेरा मानना है कि मुंबई में दायर याचिका को भी हमें इसी संदर्भ में देखना चाहिए। कानूनी चश्मे से देखें, तो सार्वजनिक बीमा कंपनियों या दूसरी सरकारी एजेंसियों द्वारा आर्थिकी या निवेश के तहत किसी दूसरी कंपनी में हिस्सेदारी लेने से रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है। मगर संभव है कि अदालत इस मामले को एक अलग नजरिये से देखे। वह नजरिया जाहिर तौर पर लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा का होगा। आखिर सरकार भी तो इसी तर्क के साथ तंबाकू कारोबार में विदेशी निवेश के अपने प्रतिबंध को जायज ठहराती है। बहरहाल, अदालत जो भी फैसला सुनाती है, उसे सरकार को मानना ही होगा; फिर चाहे इसके लिए उसे अपने दिल पर पत्थर ही क्यों न रखना पड़े।
 

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