किसान आंदोलित हैं, समाधान नदारद

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ तमिल पत्रकार Updated: 18 अप्रैल, 2017 1:15 AM

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तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर लंबे विरोध-प्रदर्शनों से न सिर्फ अपने राज्य के, बल्कि पूरे देश के अन्नदाताओं की दुर्दशा की ओर ध्यान खींचा है। इन प्रदर्शनकारियों में महिलाएं भी शामिल हैं। किसानों ने विरोध के कई अनूठे तरीके अपनाए, जिनमें से कुछ निस्संदेह अतिवादी रहे, मगर साथ ही वे प्रभावी थे। इन्होंने विरोध-प्रदर्शन के दौरान सांप की सब्जी खाई, मरे हुए चूहों को अपने मुंह में दबाया, अपनी कलाइयां काटीं, वे सड़कों पर लेटे, सिर के बल खड़े हुए, सड़कों पर फेंके चावल खाए, सिर का मुंडन किया, दाढ़ी आधी बनाई, पुरुषों ने एक दिन नवविवाहिता की तरह कपड़े पहने और अगले दिन अपने मंगलसूत्र तोड़े, नरमुंडों के साथ प्रदर्शन किया और जब प्रधानमंत्री के साथ उनकी बैठक नहीं हो सकी, तो उनके कार्यालय के बाहर नग्न प्रदर्शन किया। 

इन किसानों की मांग सामान्य है, मगर उसे लागू करना कहीं मुश्किल है। वे चाहते हैं कि राष्ट्रीय बैंकों से जितने भी कर्ज सूबे के किसानों ने लिए हैं, उन्हें माफ कर दिया जाए। हालांकि राज्य के कोऑपरेटिव बैकों से लिए गए 5,780 करोड़ रुपये के कर्ज को राज्य सरकार पहले ही माफ कर चुकी है। और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब यह लाभ सभी किसानों को मिलने जा रहा है, जबकि पहले यह माफी योजना चार एकड़ या उससे कम रकबे वाले सीमांत किसानों के लिए थी। तमिलनाडु सरकार चाहती है कि वरदा चक्रवात, बाढ़ और अभूतपूर्व सूखे की वजह से फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र उसे 40,000 करोड़ रुपये का अनुदान दे। लेकिन उसे अभी तक लगभग 2,000 करोड़ ही मिले हैं।

बहरहाल, तमिलनाडु पिछले 140 वर्षों में सबसे कम वर्षा से जूझ रहा है। पिछले वर्ष यहां महज 170 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जबकि यहां बरसात में औसतन 437 मिलीमीटर वर्षा होती है। कुल 32 जिलों में से 21 में 60 फीसदी से भी कम बारिश हुई है। नतीजतन, ग्रामीण व शहरी, दोनों इलाकों में पेयजल का संकट बढ़ चला है। कावेरी नदी राज्य में फसल-सिंचाई का बड़ा स्रोत रही है। कर्नाटक से आने वाली इस नदी को यहां की जीवनरेखा कहा जाता है। पिछले साल जून और दिसंबर के दरम्यान इस नदी से तमिलनाडु को महज 66 हजार मिलियन क्यूबिक पानी मिला, जबकि इस दौरान इसे 179 हजार मिलियन क्यूबिक पानी मिलता रहा है।

किसानों की आत्महत्या की बात तमिलनाडु सरकार ने बेमन से कबूली है। जब एक ही महीने में मौत का आंकड़ा 100 को पार कर गया, तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्टीकरण मांगा था। राज्य में लगभग 80 फीसदी किसान सीमांत हैं और उनमें से महज 30 फीसदी ही सांस्थानिक कर्ज ले पाते हैं। फसल खराब होने पर वे सूदखोरों के पास जाते हैं, जो स्वाभाविक रूप से ज्यादा दरों पर कर्ज देते हैं। तमिलनाडु में किसान अन्न की कमी या सूखे की वजह से आत्महत्या नहीं करता, क्योंकि राज्य सरकार हर किसान परिवार को कम से कम 30 किलो चावल देती है। उसकी आत्महत्या की वजह वह शर्म है, जो कर्ज न चुका पाने की स्थिति में पैदा होती है। 
इस राज्य में दक्षिण-पश्चिम मानसून से 50 फीसदी बारिश होती है और बाकी 50 फीसदी उत्तर-पूर्व मानसून से। मगर खराब मानसून ने किसानों की कमर तोड़ दी है, खासतौर से डेल्टा-क्षेत्र के, जहां 13 लाख एकड़ जमीन है और जिसे राज्य में धान का कटोरा भी कहा जाता है। भूजल का स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर जाने के कारण राज्य सरकार ने मजबूरन शक्तिशाली सिंचाई पंपों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, इन सभी वजहों से 50 लाख एकड़ की फसल बरबाद हो गई है, जिसके कारण करीब 30 लाख किसानों पर संकट गहरा गया है।

किसानों की बदहाली की एक वजह खेती-किसानी का अब फायदे का सौदा न रह जाना भी है। भले ही 60 फीसदी भारतीय खेती-बाड़ी से जुड़े हुए हैं, मगर जीडीपी में इसका योगदान 18 फीसदी से भी कम है। केंद्र व राज्य अब कृषि पर कम बजट आवंटित करने लगे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि पहले जहां केंद्र व राज्य सरकार कृषि को 18 फीसदी बजट आवंटित करती थी, वहीं अब यह बजट घटकर 2.5 फीसदी हो गया है। कारोबारी नियम-कायदों ने भी किसानों के लिए हालात प्रतिकूल बनाए हैं।
ऐसा नहीं है कि केंद्र किसानों की समस्याओं को नहीं जानता, पर यदि उसने किसी एक राज्य के किसानों को कर्ज-माफी दे दी, तो ऐसी मांगें तमाम राज्यों से उठने लगेंगी। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्य तो अधिक से अधिक केंद्रीय सहायता की मांग कर ही रहे हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी कर्ज-माफी को बेहतर उपाय नहीं माना है। अभी यह मसला इसलिए गरम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की नई सरकार ने किसानों को करीब 40,000 करोड़ रुपये की कर्ज-माफी दी है।

एक अध्ययन बताता है कि किसानों की कर्जदारी बढ़ रही है। पिछले एक दशक में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह 80 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है। अगर सरकार और अधिक पैसे झोंकती है, तो वह चंद किसानों तक सीमित रहेगी, क्योंकि करीब 60 फीसदी किसान औपचारिक कर्ज-व्यवस्था से बाहर हैं। इससे बैंकों पर भी एनपीए का बोझ अलग से बढ़ रहा है। मगर किसानों की राय इससे अलग है। उनका कहना है कि जब धनाढ्य उद्योगपतियों को कर्ज-माफी दी जा सकती है, तो फिर किसानों को क्यों नहीं? मगर सवाल यह है कि क्या कोई दूसरा रास्ता है, जिससे इस समस्या से पार पाया जा सके? जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे तमिलनाडु के किसान नदियों को जोड़ने की मांग भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर उत्तर की नदियां दक्षिण से जोड़ दी जाएं, तो उन्हें अपेक्षाकृत अधिक पानी मिलेगा। वे कावेरी मैनजमेंट बोर्ड बनाने की मांग भी कर रहे हैं।

कुल मिलाकर कहें, तो तमिलनाडु में राजनीतिक रूप से एक कमजोर सरकार होने की वजह से भी पूरे राज्य में किसी न किसी वजह से विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। भाजपा इसमें अपने लिए एक उम्मीद खोज रही है। अब इसका जो नतीजा निकले, मगर श्रेय तमिलनाडु के किसानों को ही मिलना चाहिए, क्योंकि वही खेती-किसानी की समस्या को राष्ट्रीय बहस और लूटियंस दिल्ली व दूसरे बड़े शहरों के ड्रॉइंग रूम तक लेकर गए हैं।
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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